NAM यानी गुटनिरपेक्ष आंदोलन: जब भारत ने कहा, "हम किसी के खेमे में नहीं जाएँगे


गुटनिरपेक्ष होने का मतलब क्या है

अक्सर लोग सोचते हैं कि गुटनिरपेक्ष यानी चुपचाप किनारे बैठ जाना। ऐसा नहीं था। इसका मतलब बस इतना था कि आप किसी बड़ी ताक़त के खेमे में शामिल नहीं होंगे और हर मामले पर अपना फ़ैसला खुद करेंगे। भारत ने कई मौक़ों पर अमेरिका की बात से असहमति जताई, कई बार सोवियत संघ की बात से भी। बात सिर्फ़ इतनी थी कि फ़ैसला दिल्ली में होगा, वॉशिंगटन या मॉस्को में नहीं।

उस दौर की दुनिया कैसी थी

दूसरा विश्व युद्ध ख़त्म हुआ तो दुनिया दो हिस्सों में बँट गई। एक तरफ अमेरिका और उसके साथी, दूसरी तरफ सोवियत संघ और उसके साथी। यही शीत युद्ध था। दोनों पक्ष चाहते थे कि बाक़ी देश उनके साथ आएँ।

उसी वक़्त एशिया और अफ्रीका के कई मुल्क सदियों की ग़ुलामी के बाद आज़ाद हो रहे थे। भारत 1947 में आज़ाद हुआ, इंडोनेशिया 1949 में, घाना 1957 में। इन देशों के पास पैसा कम था, ग़रीबी ज़्यादा थी और सबसे बड़ी चिंता यही थी कि आज़ादी कहीं फिर किसी की छाया में न चली जाए।

तीन पड़ाव जिन्होंने NAM की ज़मीन बनाई

1954, पंचशील: भारत और चीन के बीच हुए समझौते में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत तय हुए, जिनमें एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान और आपसी मामलों में दख़ल न देना शामिल था।

1955, बांडुंग सम्मेलन: इंडोनेशिया के बांडुंग शहर में 29 एशियाई और अफ्रीकी देश इकट्ठा हुए। उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ और आपसी सहयोग के पक्ष में यहीं खुलकर बात हुई। NAM की वैचारिक जड़ें यहीं से मानी जाती हैं।

1961, बेलग्रेड: यूगोस्लाविया की राजधानी में पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन हुआ और आंदोलन की आधिकारिक शुरुआत हुई।

पाँच नेता, एक साझा सोच

नेहरू (भारत), टीटो (यूगोस्लाविया), नासिर (मिस्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया) और न्क्रूमा (घाना)। ये पाँचों अलग-अलग मिज़ाज के नेता थे, पर एक बात पर सहमत थे कि नए आज़ाद देशों को हथियारों की होड़ में पड़ने के बजाय अपने लोगों का पेट भरने और विकास पर ध्यान देना चाहिए।

नेहरू का तर्क सीधा था। जिस देश में करोड़ों लोग भूखे हों, वह किसी महाशक्ति का सैन्य गुट जॉइन करके क्या हासिल करेगा?

NAM किन बातों के लिए खड़ा था

आंदोलन के मुख्य मुद्दे थे उपनिवेशवाद और नस्लभेद का विरोध, हर देश की संप्रभुता और सीमाओं का सम्मान, सैन्य गुटों से दूरी, निरस्त्रीकरण और विकासशील देशों के बीच आपसी आर्थिक सहयोग। दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद के ख़िलाफ़ इसने दुनिया भर में दबाव बनाने में भूमिका निभाई।

1991 के बाद क्या बदला

सोवियत संघ बिखरा तो शीत युद्ध ख़त्म हो गया। अब जब दो गुट ही नहीं बचे, तो "गुटों से दूर रहने" वाले आंदोलन का क्या काम? आलोचक यही सवाल उठाते हैं, और यह सवाल जायज़ भी है। NAM की आवाज़ पहले जितनी तेज़ नहीं रही।

फिर भी यह आंदोलन ख़त्म नहीं हुआ। आज इसके लगभग 120 सदस्य हैं और संयुक्त राष्ट्र के बाद यह दुनिया के सबसे बड़े देश-समूहों में गिना जाता है। हाल में इसकी अध्यक्षता अज़रबैजान के बाद युगांडा के पास आई है। इसका फ़ायदा यह है कि विकासशील देशों को एक ऐसा मंच मिल जाता है जहाँ वे अपनी बात साथ मिलकर रख सकें।

आज का भारत: नाम बदला, सोच वही

अब सरकारें "गुटनिरपेक्षता" शब्द कम बोलती हैं। उसकी जगह "रणनीतिक स्वायत्तता" और "मल्टी-अलाइनमेंट" जैसे शब्द चलते हैं। मतलब वही है कि भारत अमेरिका, रूस, यूरोप और खाड़ी देशों, सबसे रिश्ते रखेगा और जहाँ जिससे फ़ायदा होगा, वहाँ उससे बात बढ़ाएगा। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत का रुख़ इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है।

एक बदलाव और दिखता है। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री खुद NAM शिखर सम्मेलनों में नहीं गए, जबकि भारत ने खुद को "ग्लोबल साउथ" की आवाज़ के तौर पर पेश करने पर ज़्यादा ज़ोर दिया है।