बेला एस्टेट में 728 में से सिर्फ 1 वोटर बचा? राहुल गांधी का चुनाव आयोग पर नया हमला
बड़ी बातें
- राहुल गांधी के मुताबिक बेला एस्टेट के 727 निवासियों के नाम SIR में कटे
- उनका कहना है कि ये लोग दशकों से यहां रहते हैं और 2024 लोकसभा व 2025 दिल्ली चुनाव में वोट डाल चुके हैं
- राहुल ने चुनाव आयोग के "मकान नंबर 0" वाले प्रावधान का हवाला देकर पूछा कि इनके नाम क्यों कटे
- तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने SIR को वापस लेने की मांग की
- इस मामले पर चुनाव आयोग का बेला एस्टेट को लेकर सीधा जवाब अभी सामने नहीं आया है
क्या है पूरा मामला
राहुल गांधी ने X पर लिखा कि बेला एस्टेट में 728 लोग रहते हैं, लेकिन SIR के बाद वोटर लिस्ट में सिर्फ एक नाम बचा है। उन्होंने यह भी कहा कि इन लोगों के घर 2023 में तोड़ दिए गए थे, फिर भी ये लोग वहीं रह रहे हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, विवाद दिल्ली के SIR की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से शुरू हुआ, जो 31 अगस्त को जारी हुई थी। उसी रिपोर्ट में कहा गया है कि ड्राफ्ट लिस्ट में इस बस्ती के 729 मतदाताओं में से 728 बाहर थे। यह आंकड़ा एक ही स्रोत से आया है, इसलिए इसकी पुष्टि आधिकारिक आंकड़ों से होनी बाकी है।
राहुल ने बस्ती में क्या कहा
राहुल गांधी ने कहा कि वे खुद झुग्गियों में गए और लोगों से सुना कि उनके साथ क्या हुआ। उन्होंने इसे "वोट चोरी का तरीका" बताया। इसके अलावा, वे इलाके के SDM से भी सवाल करते दिखे।
"मकान नंबर 0" का सवाल
राहुल ने चुनाव आयोग के उस प्रावधान का ज़िक्र किया जिसमें बेघर मतदाताओं के लिए "मकान नंबर 0" की व्यवस्था है। उनका सवाल है कि जब आयोग खुद ऐसे लोगों को वोटर बनाने का रास्ता देता है, तो इस बस्ती के नाम क्यों हटाए गए। इस सवाल का जवाब आयोग की तरफ से आना अभी बाकी है।
आयोग पर बढ़ता दबाव
यह हमला ऐसे समय आया है जब आयोग पहले से घिरा हुआ है। एक अख़बार की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया कि SIR से जुड़े फैसलों पर तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी। इस पर आयोग ने शनिवार को सफाई दी कि SIR के कार्यक्रम से जुड़े सभी फैसले आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए थे। उसी दिन राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर "मैच फिक्सिंग" का आरोप भी लगाया था।
विपक्ष के दूसरे नेता क्या बोले
रेवंत रेड्डी ने कहा कि जैसे अंग्रेज़ों ने साइमन कमीशन का इस्तेमाल किया था, वैसे ही भाजपा चुनाव आयोग का इस्तेमाल कर रही है, और मांग की कि SIR वापस लिया जाए। यह भाजपा पर लगाया गया विपक्ष का आरोप है, जिस पर भाजपा की प्रतिक्रिया इस रिपोर्ट में शामिल नहीं है।
वोटर लिस्ट की सफाई अपने आप में गलत नहीं है। फर्जी, दोहराए हुए या मृत मतदाताओं के नाम हटना लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। लेकिन जब एक पूरी बस्ती के लगभग सभी नाम एक साथ कटते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हटाने का आधार क्या था।
चुनाव आयोग के लिए सबसे अच्छा रास्ता पारदर्शिता है। उसे बताना चाहिए कि बेला एस्टेट के नाम किस कारण हटे: मृत, स्थानांतरित, पता नहीं मिला या कुछ और। साथ ही, ड्राफ्ट लिस्ट के बाद आम तौर पर दावे-आपत्ति का मौका होता है, इसलिए आयोग को इस बस्ती के लोगों तक पहुंचकर नाम दोबारा जुड़वाने में मदद करनी चाहिए। इससे उसकी साख भी बचेगी।
विपक्ष के लिए भी ज़िम्मेदारी है। सिर्फ बड़ा आंकड़ा और राजनीतिक हमला काफी नहीं है। अगर दावा सही है, तो प्रभावित लोगों की सूची और दस्तावेज़ आयोग को औपचारिक रूप से दें, ताकि मामला सुधार तक पहुंचे, सिर्फ बयानबाज़ी तक नहीं।
